डॉ. मोहन यादव
लोकतंत्र में सत्ता की चाबी जनता के हाथ में होती है। मतदान केंद्र पर खड़ा सामान्य नागरिक अपने एक मत से सरकार बनाता है, उसके काम का मूल्यांकन करता है और भविष्य की दिशा तय करता है। उसकी यह शक्ति किसी राजनीतिक दल की देन नहीं है। यह हमारे संविधान की व्यवस्था है, जिसकी रक्षा करना हम सबका दायित्व है। इसीलिए लोकतंत्र की रक्षा का दावा करने वाले प्रत्येक राजनीतिक दल से जनता को यह अपेक्षा करने का अधिकार है कि वह अपने व्यवहार में भी लोकतांत्रिक मर्यादाओं का पालन करे। लोकतंत्र के प्रति निष्ठा की परीक्षा सत्ता में रहते हुए भी होती है और विपक्ष में बैठकर भी। जनादेश का सम्मान सुविधा के अनुसार नहीं हो सकता।
राजनीतिक प्रतिस्पर्धा में जीत का उत्सव और हार का आत्म-मंथन, दोनों आवश्यक हैं। जनता के निर्णय से असहमति हो सकती है, लेकिन उसके विवेक का अनादर लोकतांत्रिक राजनीति को कमजोर करता है। राजनीतिक दलों को जनता का विश्वास अपने कार्य, विचार और आचरण से अर्जित करना चाहिए। विरोध की राजनीति में जनता का हित नहीं होता। एक सशक्त विपक्ष लोकतंत्र की आवश्यकता है। सरकार से कठिन प्रश्न पूछना, नीतियों की कमियाँ उजागर करना और बेहतर विकल्प प्रस्तुत करना उसकी महत्वपूर्ण भूमिका है। सरकार की भी जिम्मेदारी है कि वह प्रश्नों का उत्तर दे और उचित सुझावों को स्वीकार करे। लेकिन जब राजनीतिक विमर्श का केंद्र समाधान के स्थान पर निरंतर भय, अविश्वास और टकराव बनने लगे, तब उसका मूल्यांकन भी होना चाहिए।
आज विशेष गहन पुनरीक्षण एसआईआर को लेकर भी राजनीतिक बहस हो रही है। इस बहस का केंद्र प्रत्येक पात्र नागरिक का अधिकार और मतदाता सूची की विश्वसनीयता होना चाहिए। एक सही मतदाता सूची लोकतंत्र की बुनियादी आवश्यकता है। उसमें नए पात्र मतदाताओं के नाम जुड़ें, गलत विवरण सुधरें और मृत अथवा दोहरी प्रविष्टियों का निराकरण निर्धारित प्रक्रिया से हो। साथ ही, किसी पात्र नागरिक का नाम छूटने पर उसे सुधार का प्रभावी अवसर मिले। जनता के नाम पर राजनीति करने वालों को जनता की सुविधा और सुरक्षा के प्रति भी जवाबदेह होना होगा। हमारा दृष्टिकोण स्पष्ट होना चाहिए, शांतिपूर्ण विरोध को सम्मान मिले और हिंसा पर निष्पक्ष, विधिसम्मत कार्रवाई हो। मतदाता सूची पर बहस हो, लेकिन मतदाता के मन में भ्रम नहीं फैलाया जाना चाहिए।
मतदाता सूची के पुनरीक्षण कार्य में जिस प्रकार से विपक्ष के लोगों ने देश में अराजकता फैलाने का काम किया है, वह राष्ट्रहित में नहीं है। हमारे संविधान में मतदाता को जो अधिकार दिये गये हैं, उसी से हमारे लोकतंत्र को मजबूती मिलती है। भारत के कुछ अंचलों में बाहरी लोगों का मतदाता बन जाना कहा का कानून है। यदि एसआईआर में मतदाता सूची का शुद्धीकरण हो रहा है तो विपक्ष को भी साथ देना चाहिए, न कि उसका विरोध करना चाहिए। मुझे इस बात पर भी आश्चर्य होता है कि विपक्ष ईवीएम का भी विरोध कर रहा है। हाल ही में चार बड़े राज्यों उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र, बिहार कर्नाटका में एमएलसी के चुनाव में वेलेट पेपर से मतदान हुआ। इन राज्यों के चुनाव परिणामों में कांग्रेस को कितनी सीटे मिली यह सब जानते है। इसके बावजूद भी विपक्ष अपनी फितरत से बाज नहीं आता।
समाज निरंतर बदलता है। लोग आजीविका के लिए स्थान बदलते हैं, युवा मतदान की आयु पूरी करते हैं और परिवारों की परिस्थितियाँ बदलती हैं। इन परिवर्तनों के अनुरूप मतदाता सूची का अद्यतन आवश्यक है। किसी प्रक्रिया में कठिनाई सामने आए तो उसे दूर करना चाहिए। किसी त्रुटि का प्रमाण मिले तो उसका सुधार होना चाहिए। मतदाता की सहायता किए बिना केवल उसकी आशंका को राजनीतिक अभियान का ईंधन बनाना सार्वजनिक जिम्मेदारी से बचना है। लोकतंत्र की चिंता व्यवहार में दिखनी चाहिए। किसी मतदाता की समस्या हल कराने में लगाया गया श्रम, उसके भय को बढ़ाने वाले भाषणों से अधिक उपयोगी है।
मुख्यमंत्री के रूप में मेरा विश्वास है कि प्रदेश की ऊर्जा, विकास और निर्माण में लगनी चाहिए। किसान को बेहतर अवसर चाहिए, युवा को रोजगार और कौशल चाहिए, महिलाओं को सुरक्षा चाहिए और प्रत्येक परिवार को संवेदनशील शासन चाहिए। इन अपेक्षाओं की पूर्ति के लिए शांति, कानून-व्यवस्था और सामाजिक विश्वास आवश्यक हैं। हम राजनीतिक बहस को जनता के वास्तविक प्रश्नों से जोड़ें। सरकार अपने काम का हिसाब दे। विपक्ष बेहतर विकल्प रखे। नागरिक निर्भय होकर अपनी बात कहें। निर्वाचन प्रक्रिया में प्रत्येक पात्र मतदाता की भागीदारी सुनिश्चित हो इसके लिए सबको मिलकर सहयोग करना होगा।
लोकतंत्र की ताकत उस नागरिक के विश्वास में है, जो कह सके कि सरकार किसी भी दल की हो, उसके अधिकार और सम्मान की रक्षा होगी। “लोकतंत्र बचाओ-अराजकता हटाओ” केवल एक नारा या विचार नहीं, बल्कि हर जागरूक नागरिक का कर्तव्य भी है। हर राजनैतिक दल का यह दायित्व होना चाहिए कि जनादेश का सम्मान हो, विरोध में मर्यादा हो, शासन में जवाबदेही हो और कानून के सामने सब समान हों। भारत की दिशा जनता अपने मत से तय करेगी। राजनीतिक सफलता का रास्ता उसी जनता के विश्वास अर्जित करने से होकर जाएगा। यही लोकतंत्र की सच्ची भावना है।
(लेखक मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री हैं)